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गुजरात में 542 करोड़ की डेजर्ट नाइट सफारी, 2,700 जानवरों वाला बड़ा प्रोजेक्ट

  • लेखक की तस्वीर: Rashtrix News Desk
    Rashtrix News Desk
  • 16 अग॰
  • 3 मिनट पठन

गुजरात के शुष्क इलाके में अब एक बिल्कुल अलग तरह का वन्यजीव पर्यटन केंद्र बनाने की तैयारी है। उत्तर गुजरात के बनासकांठा जिले के जुना डीसा में प्रस्तावित डेजर्ट जूलॉजिकल पार्क में रात की सफारी इसका सबसे बड़ा आकर्षण होगी। परियोजना की अनुमानित लागत 542.14 करोड़ रुपये है और करीब 103 हेक्टेयर सरकारी जमीन पर इसे विकसित करने की योजना है। पर्यटक विशेष वाहनों से रात के समय निर्धारित क्षेत्रों में घूम सकेंगे और रेगिस्तानी तथा शुष्क इलाकों के अनुरूप तैयार वातावरण में वन्यजीव देख सकेंगे।

रेगिस्तान के भूगोल को ही बनाया जाएगा आकर्षण

जुना डीसा को चुनने के पीछे यहां का प्राकृतिक भूगोल अहम है। इलाके में रेत के टीले हैं, पास में बनास नदी है और सड़क तथा रेल संपर्क भी उपलब्ध है। योजना का उद्देश्य प्राकृतिक शुष्क परिदृश्य को हटाकर पारंपरिक चिड़ियाघर बनाना नहीं, बल्कि उसी भूगोल के आसपास अलग-अलग हैबिटैट जोन तैयार करना है।

डे जू के साथ पांच नाइट सफारी एनक्लोजर

प्रस्ताव में डे जू, पांच विशेष नाइट सफारी एनक्लोजर, शाकाहारी और मांसाहारी जानवरों के लिए अलग क्षेत्र, एवियरी, रेप्टाइल गार्डन, बटरफ्लाई गार्डन और इंटरप्रिटेशन सेंटर शामिल हैं। पर्यटकों के लिए फूड कोर्ट, स्मारिका दुकान और गोल्फ कार्ट जैसी सुविधाओं की भी योजना है।

83 प्रजातियों के करीब 2,700 जानवर

प्रस्तावित पार्क में करीब 2,700 जानवर और पक्षी रखे जाने की योजना है, जो लगभग 83 प्रजातियों से संबंधित होंगे। भारतीय प्रजातियों में चिंकारा, ब्लैकबक, भारतीय जंगली गधा, एशियाई शेर, तेंदुआ, डेजर्ट फॉक्स, भेड़िया, सियार, स्ट्राइप्ड हाइना, कैराकल और कई प्रकार के खरगोश शामिल हैं।

योजना में अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के शुष्क क्षेत्रों से जुड़े जानवरों को भी शामिल करने का प्रस्ताव है। सूची में जिराफ, ग्रेवी जेब्रा, स्किमिटर-हॉर्न्ड ऑरिक्स, कूडू, स्प्रिंगबोक, गजेल, ब्लैक राइनो, मीरकैट, अफ्रीकी चीता और अफ्रीकी शेर के साथ कंगारू, एमू और वॉलबी जैसे जानवर भी शामिल हैं।

रात की सफारी क्यों होगी खास?

नाइट सफारी इस परियोजना की सबसे बड़ी पर्यटन पेशकश होगी। पर्यटक वाहनों में बैठकर तय क्षेत्रों से गुजरेंगे और कम रोशनी वाले वातावरण में जानवरों को देख सकेंगे। इसका उद्देश्य सिर्फ जानवर दिखाना नहीं, बल्कि रात में सक्रिय वन्यजीवों के व्यवहार और रेगिस्तानी परिदृश्य का अलग अनुभव देना है।

पर्यटन के साथ संरक्षण पर भी जोर

परियोजना में संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा को भी जगह देने की योजना है। कंजर्वेशन ब्रीडिंग, वन्यजीव रेस्क्यू और रिहैबिलिटेशन, पर्यावरण शिक्षा तथा इंटरप्रिटेशन जैसी गतिविधियां प्रस्तावित हैं। भारतीय रेगिस्तानी वन्यजीवों के साथ दुनिया के दूसरे शुष्क इलाकों के जीवों को दिखाकर कठोर पर्यावरण में जानवरों के अनुकूलन को समझाने की कोशिश भी की जा सकती है।

रेगिस्तान में इतने बड़े प्रोजेक्ट की पर्यावरणीय चुनौती

इतने बड़े प्रोजेक्ट के साथ पानी, ऊर्जा, कचरा प्रबंधन और पर्यावरणीय असर सबसे महत्वपूर्ण सवालों में होंगे। योजना में वर्षा जल संचयन, सीवेज ट्रीटमेंट, ठोस कचरा प्रबंधन, सौर ऊर्जा, स्थानीय प्रजातियों के पौधारोपण और ग्रीन बफर जोन जैसी व्यवस्थाओं का प्रस्ताव है। रेगिस्तानी इलाके में पानी का टिकाऊ प्रबंधन परियोजना की बड़ी परीक्षा होगी।

उत्तर गुजरात के पर्यटन मानचित्र में नई कड़ी

जुना डीसा को वडनगर, अंबाजी और नडाबेट जैसे पर्यटन स्थलों से जोड़कर उत्तर गुजरात का बड़ा पर्यटन सर्किट बनाने की संभावना भी देखी जा रही है। अगर परियोजना प्रस्तावित स्तर पर विकसित होती है, तो होटल, परिवहन, गाइड, खान-पान और स्थानीय कारोबार को भी पर्यटकों की बढ़ती संख्या से फायदा मिल सकता है।

जंगल नहीं, गुजरात का रेगिस्तान होगा सफारी का मंच

भारत में सफारी की पहचान आम तौर पर जंगल और बड़े बिल्लियों से जुड़ी है। गुजरात की यह योजना एक अलग तस्वीर पेश करती है—रेगिस्तान, रेत के टीले, रात में सफारी और खुले आसमान के नीचे वन्यजीव। 542 करोड़ रुपये की यह परियोजना आखिरकार सिर्फ एक नया चिड़ियाघर बनती है या रेगिस्तान आधारित टिकाऊ वन्यजीव पर्यटन का नया मॉडल, यह इसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।

स्रोत नोट: परियोजना की लागत, जमीन, जानवरों की संख्या, प्रजातियों और बुनियादी ढांचे से जुड़ी जानकारी प्रस्तावित परियोजना और उसके अनुमोदनों पर प्रकाशित रिपोर्टों पर आधारित है।

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