'नक्सली सोच' पर मोदी की टिप्पणी से विवाद, CJP का सवाल: सरकार से सवाल करना भी क्या 'दिमागी नक्सलवाद' है?
- Rashtrix News Desk

- 16 अग॰
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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में 'दिमागी नक्सल' की चेतावनी ने भारत में असहमति, राजनीतिक आलोचना और राष्ट्रीय सुरक्षा की सीमाओं पर नई बहस छेड़ दी है। मोदी ने कहा कि सशस्त्र नक्सलवाद कमजोर पड़ रहा है, लेकिन नक्सली सोच रखने वाले लोग अभी भी चुनौती बने हुए हैं।
The Telegraph की रिपोर्ट में सामने आई CJP की प्रतिक्रिया का केंद्र यही सवाल है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, राजनीतिक असहमति और हिंसक उग्रवाद का समर्थन अलग-अलग चीजें हैं।
मोदी ने क्या कहा?
स्वतंत्रता दिवस के भाषण में मोदी ने कहा कि वर्षों की सुरक्षा कार्रवाई और विकास प्रयासों के बाद सशस्त्र नक्सलवाद अंतिम चरण में है। लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि नक्सली विचारधारा से प्रभावित लोग अवसर मिलने पर हिंसा और अशांति को बढ़ावा दे सकते हैं।
विवाद क्यों बढ़ा?
'दिमागी नक्सल' शब्द पहले से विवादित 'अर्बन नक्सल' राजनीतिक शब्दावली की याद दिलाता है। CJP की आपत्ति इसी अंतर को लेकर है—सरकारी फैसले पर सवाल उठाना और सशस्त्र आंदोलन का समर्थन करना एक बात नहीं।
सरकार का तर्क
सरकार का तर्क राष्ट्रीय सुरक्षा पर आधारित है। जो लोग जानबूझकर सशस्त्र नक्सली आंदोलन का समर्थन या वैधता प्रदान करते हैं, उन्हें सामान्य राजनीतिक असहमति के साथ नहीं रखा जा सकता।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
मोदी की टिप्पणी पर विपक्षी नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे राजनीतिक भाषा बताया और आरोप लगाया कि ऐसे शब्दों के जरिए असहमति को चरमपंथ के साथ जोड़ने की कोशिश हो रही है।




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